दरभंगा।मानवाधिकार इमरजेंसी सोशल हेल्पलाइन( अपराध एवं सामाजिक सुरक्षा) के प्रदेश अध्यक्ष अभिजीत कुमार ने बिहार पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि भ्र्ष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रही पुलिस के कारण निर्दोष व्यक्ति को भी महीनो जेल में बंद होकर नारकीय जीवन बिताने पर मजबूर है ।आगे प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि गंभीर अपराधों की प्राथमिकी के बाद पुलिस तत्काल आरोपित अभियुक्त को गिरफ्तार कर जेल भेज देती है ।उसके बाद अनुसंधान में लग जाती है। अनुसंधानकर्ता का कर्तव्य है कि घटनास्थल पर जाकर घटना से संबंधित साक्षी एवं आसपास के लोगों से पूछताछ कर उनका बयान केस डायरी में अंकित करना खासकर अगर भौतिक साक्ष्य ना मिले तो ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्र गवाहों का बयान अंकित करना होता है ।लेकिन बिहार पुलिस अपने पुराने स्टाइल से मोबाइल पर ही अनुसंधान कर लेती है।
अधिकांश मामलों में देखने को मिलता है कि अनुसंधानकर्ता की मांग को अगर आरोपी पक्ष मान लेते हैं तो उसे केस डायरी में घुमा फिरा कर आरोप मुक्त कर दिया जाता है ।अगर वादी पक्ष अनुसंधानकर्ता को खुश कर देते हैं तो आरोपी पर लगा आरोप को केस डायरी में सत्य बताया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गंभीर अपराधों में अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी एवं छोटे अपराधों में पुलिस निरीक्षक की होती है। उनका काम होता है कि अनुसंधानकर्ता द्वारा ठीक तरीके से अनुसंधान किया गया या नहीं ।अगर उन्हें ठीक नहीं लगता तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर कार्रवाई का आदेश दिया जाता है। लेकिन अक्सर यहां भी देखा जाता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त पदाधिकारी भी घटना में संलिप्त आरोपी को भी आरोप मुक्त एवं घटना में नहीं रहने वाले व्यक्ति को भी आरोप सत्य करार देते हुए अपने मन मुताबिक निर्देश देते हैं। जिस कारण कई महीनों निर्दोष व्यक्ति को भी जेल में बदतर जिंदगी जीनी पड़ती है ।क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता है। जब तक कांड का पुनः जांच कर आरोपित पाए गए ऐसे भ्रष्ट अनुसंधानकर्ता एवं पर्यवेक्षण पदाधिकारी पर वरीय पुलिस पदाधिकारी द्वारा दंडात्मक करवाई नहीं होगी तब तक ऐसे ही निर्दोष व्यक्ति जेल में अपनी किस्मत लिखते रहेंगे।