क्या दुनिया थी बचपन का, खिलौने खेल छूटपन का छुपा

पंकज कुमार सिन्हा की कलम से बचपन

क्या दुनिया थी बचपन का
खिलौने खेल छूटपन का
छुपा छुपी मै छुप जाते
कभी चक्के को दौड़ाते
घड़ी वो ताड़ के पत्ते
चबाए पान लीची के
बेपरवाह दौड़ पड़ते थे।
कभी साढ़ों के हम पीछे
कभी बतू के सींगों से
सीना तान कर चलते
कभी तितली के रंगों से
तिलक ललाट पर करते
गर सीकिया को चुपके से
पकड़ कर खूब उड़ाए थे।
उड़ते बगुलो से नाखून पर
चित्ती कौड़ी मांगे थे।
वो लप सलाई की गुदगुदी
वो काग दोष का खेल
रेलगाड़ी बनी जब टोली
छुक छुक चलती रेल
कटैया के फूलों का
सीटी कितना सुहाना था।
सच कहूं तो बचपन
खुशियों का खजाना था।
चुराकर खेतो से छीमी
मटर के खूब खाए हैं।
खेसारी साग की मुंडी
चुपके से चबाए हैं।
स्कूलों में लगी घंटी
मिसर गुरुजी आते थे।
लगाकर हाजिरी फिर वो
हम सबको बुलाते थे
कोई सर को खुजाता था
कोई पैर दबाते थे।
गुरुजी ऊंघते ही नींद से
डपट हल्ला दबाते थे।
सिलेटो को भंगोरिया से
भींगाकर खूब सुखाए हैं।
चढ़कर पेड़ अरहुल के
कली भी खूब खाए हैं।
टिफिन से पहले की
जब बजती थी घंटी
झाड़ अपने ही चट्टी को
धूलों में खुब नहाए हैं।
कभी गिल्ली डंडा में
कभी गोली के एटन में
कभी अंडी और चप्पो में
वाह क्या खूब जमाना था
पदना और पदाना था।
सच कहूं तो बचपन
खुशियों का खजाना था।
वो पेड़ों की डाली से
लटक कर झुलते रहना
गोरैया के घरौंदों से
उठा बच्चे को ले आना
थक कर खेल ढीलो से
जामुन चुनते खाते
बारिश तेज होती थी
घरों को दौड़ पड़ते थे।
फिर कई खेल सजते थे
कई धमाल मचते थे।
कहीं कागज की कश्ती पर
चींटी की चली डोली
कहीं आठ घर गोटी
कहीं धप्पो की टोली
सावन में खुब खेले हैं
पचीसी खेल कौड़ी के
कभी गुड्डे की शादी में
बाराती बनकर नाचे है।
कभी केले के पत्तों से
मधुर सीटी बजाए हैं।
तौल मिट्टी तराजू से
वो बनियापन सुहाना था।
सच कहूं तो बचपन
खुशियों का खजाना था।
कभी कुआं पर जमती थी
नंगे बचपन की टोली
मजा फिर खुब आता था।
पलट बेल्टी उलटने की
कभी बैलगाड़ी की
घंटी टन टनाती थी
फिर दौड़ लगती थी।
लटक कर दूर चलने की
वो राजा मंत्री चोर सिपाही
टिप्पो गेंद में भागे भाई
झिझिर कोना छैके कोना
रुमाल चोर का पकड़ा जाना
वो पुलिया पर चढ़कर
गढ्ढों को तड़प जाना
वो बुढ़िया कबड्डी में
चुपके से दौड़ जाना
कित कित के खेल में
घर को तड़प जाना
सूखे ताड़ के पत्तो का
क्या घिड़नी नचाना था
सच कहूं तो बचपन
खुशियों का खजाना था।

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