साहित्यकार अमृत राय की जयंती विश्वविद्यालय हिंदी विभाग में मनायी गयी

दरभंगा। विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में लोकप्रिय साहित्यकार अमृत राय की जयंती मनायी गयी। इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो० राजेन्द्र साह ने कहा कि अमृत राय ने न केवल कहानी, उपन्यास आदि का सृजन किया अपितु हिंदी आलोचना के क्षेत्र में भी अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करायी। उन्होंने कहा कि अमृत राय का जो रचनात्मक अवदान है उस पर निरन्तर शोध कार्य होने की आवश्यकता है। प्रेमचंद ने जिस परम्परा को अपने रचनात्मक कर्म के द्वारा आगे बढ़ाया, अमृत राय उसे बहुत आगे तक ले गए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की जीवनी ‘कलम के सिपाही’ के शीर्षक पर विचार करने की जरूरत है। उन्होंने ‘सिपाही’ शब्द पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शब्द बहुत ही अर्थव्यंजक है। सिपाही, जो दिन-रात, हवा-पानी, धूप आदि तमाम झंझावातों को झेलते हुए लगातार देश, समाज आदि की रक्षा के लिए तत्पर रहता है। सिपाही होना कितनी मेहनत का कार्य है यह समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समाज उनके साहित्य के केंद्र में रहा। अपनी वाणी को विराम देते हुए उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण बात की ओर इशारा किया कि जहाँ प्रेमचंद की भाषा में सहजता और स्वाभाविकता है वहीं अमृत राय में बौद्धिकता अधिक है।इस अवसर पर पूर्व अध्यक्ष प्रो० चंन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि अमृतराय कालजयी साहित्यकार थे|उन्होंने कहा कि वे प्रगतिवादी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे|
हिंदी विभाग के सह प्राचार्य डॉ० सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने इस अवसर पर कहा कि अमृत राय बहुत ही महत्त्वपूर्ण साहित्यकार हैं, यह बात दीगर है कि उनकी हिंदी साहित्य जगत में लगातार उपेक्षा की गई। वे मार्क्सवादी आलोचक, विचारक, चिंतक, कहानीकार, उपन्यासकार रहे। साहित्य की सेवा करने के क्रम में उन्हें जेल की यात्रा भी की। उन्होंने कहा कि ‘कलम का सिपाही’ प्रेमचंद की जीवनी है और हिंदी साहित्य की बहुमूल्य सम्पदा। डॉ० सुमन ने यह बताया कि उन्होंने कई विदेशी साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद भी किया। ‘नदी के द्वीप’ की जिस ढंग से उन्होंने आलोचना की थी उससे हिंदी साहित्य में भूचाल आ गया था। अमृत राय ने उस दौर में अज्ञेय को व्यक्तिवादी और अहंकारी कहा था जब लोग उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव भी रहे। अपनी वाणी को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि वे जीवनपर्यंत प्रेमचंद की विरासत को आगे बढाते रहे।
ललित नारायण जनता महाविद्यालय, झंझारपुर के सहायक प्राचार्य श्री चन्द्रशेखर आजाद ने कहा कि अमृत राय बड़े उपन्यासकार और कहानीकार के रूप में याद किये जाते हैं। ‘मंगलसूत्र’ उपन्यास को पूरा कर उन्होंने प्रेमचंद के अधूरे कार्य को पूरा किया।
सी०एम०कॉलेज, दरभंगा के सहायक प्राचार्य अखिलेश राठौर ने कहा कि प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय का विवाह सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान से हुआ था। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और अमृत राय ने व्यावहारिक रूप से उन चीजों को अपने जीवन में उतारा जिसका वे अपने साहित्य में समर्थन करते थे। ‘हेमलेट’ का अनुवाद उन्होंने नवीन दृष्टि से किया था। उन्होंने कहा कि समतामूलक समाज की स्थापना के लिए जैसी सामान्य भाषा की आवश्यकता थी वैसी ही भाषा का प्रयोग अमृत राय की रचनाओं में दिखता है। उन्होंने आमजन की भाषा में ही आजीवन साहित्य सृजन किया।
हिंदी विभाग के शोधप्रज्ञ कृष्णा अनुराग ने इस अवसर पर कहा कि विश्वविद्यालय हिंदी विभाग निरन्तर साहित्यकारों की जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन कर अपनी जीवंतता और गतिशीलता का परिचय दे रहा है। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि मार्क्सवादी साहित्यकार अमृत राय को मार्क्सवादियों ने ही भुला दिया है। हिंदी साहित्य में जो खेमेबाजी होती है उसकी वजह से कई बड़े साहित्यकारों को भुला दिया गया है, जिनका साहित्य जगत में योगदान अविस्मरणीय रहा है।
इस अवसर पर अमृत राय के कर्तृत्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ० आनन्द प्रकाश गुप्ता ने विषय प्रवर्तन किया साथ ही मंच का संचालन भी सफलतापूर्वक किया।
इस अवसर पर शोधप्रज्ञ अभिशेक कुमार सिन्हा, धर्मेन्द्र दास, पुष्पा कुमारी समेत बड़ी संख्या में स्नातकोत्तर प्रथम और तृतीय छमाही के छात्र उपस्थित थे।

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