दरभंगा । ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पैट-2019 से मुक्त शोधार्थियों को यूजीसी नेट, जेआरएफ, टीचर फेलोशिप आदि लिखा कोर्स वर्क प्रमाण पत्र बांट दिया गया। जबकि इससे पूर्व पैट-2018 तक शोधार्थियों को पैट रिजल्ट के बाद विषयवार क्रमांक आवंटित किया जाता था, जिसमें विषय कोड एवं वर्ष भी स्पष्ट होता था।
आश्चर्य की बात यह है कि उक्त श्रेणी के शोधार्थियों ने इसे स्वीकार भी कर लिया। कुछ शोधार्थियों ने पैट क्रमांक के जगह नेट का क्रमांक तक लिखवा रहे हैं। शोधार्थियों के द्वारा इस तरह के त्रुटिपूर्ण हस्तलिखित कोर्स वर्क प्रमाण पत्र स्वीकार करना भी उनके जानकारी के अभाव को दर्शाता है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शोध की कल्पना कैसे किया जा सकता है?
विश्वविद्यालय में कम्प्यूटराइज्ड कोर्स वर्क प्रमाण पत्र का मुद्दा अबतक ठंडा भी नहीं हुआ कि नई खुलासा से विश्वविद्यालय पीएचडी विभाग फिर से चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। पहले से ही 27 जुलाई को परीक्षा परिषद में स्वीकृति के पश्चात भी पैट-2019 के शोधार्थियों को हस्तलिखित कोर्स वर्क प्रमाण पत्र अगस्त के प्रथम सप्ताह से बांटा जा रहा है। अधिकांश शोधार्थी अबतक कम्प्यूटराइज्ड प्रमाण पत्र को लेकर अडिग है।
विश्वविद्यालय प्रशासन पैट-2020 से कम्प्यूटराइज्ड प्रमाण पत्र की जिद्द पर है, जबकि यह मांग पैट-2019 के शोधार्थियों का हमेशा से रहा है। ज्ञात हो कि पैट-2018 के शोधार्थियों को पीआरटी का हस्तलिखित कोर्स वर्क प्रमाण पत्र निर्गत कर दिया गया।
पीएचडी विश्वविद्यालय का श्रेष्ठतम उपाधि माना जाता है इसके बावजूद इसमें इतने खामियों के बाद पीएच०डी० विभाग एवं पदाधिकारियों के कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह स्वाभाविक है।