जमीनी विवाद का मकड़जाल, सरकारी अधिकारियों की संवेदनहीनता के कारण पिस रही आम जनता
मोहन चन्द्रवंशी
दरभंगा। जिले में जमीनी विवाद का मामला परेशानी का कारण बना हुआ है। थाना, सीओ और कर्मी समाधान के बदले मामलों को उलझाने में लगे रहते हैं।
सरकार के आदेश के मुताबिक जमीनी विवाद मामले को प्रत्येक शनिवार को सीओ और थानेदार मिल कर सुलझाने का काम करेंगे । लेकिन हकीकत में जनता दरबार दरवारी कराने के शिवाय कुछ नही है। अधिकांश पीड़ितों की यही शिकायत है।
कहा जाता है कि जमीनी विवाद मामले में दोनों पक्ष पैसे के बल पर अपने पक्ष में करने के जुगाड़ में लगा रहता है इसी का फायदा थाना उठा लेती है।ऐसा नही की सरकार या जिला प्रशासन जानती नही है। सब कुछ जान कर भी अनजान बने रहते है।
आइये बिबाद का माजरा समझते है। गांव में किसी के हिस्से का जमीन है और उन्ही का फरीक वर्षो बाद दावा करता है कि जमीन हमारी है। दूसरा पक्ष मजबूत है इसलिय पहला पक्ष के कब्जे बाली जमीन को दूसरा पक्ष कब्जा कर लेता है और दोनों पक्ष में मारपीट होता है मामला थाना तक पहुँचता है।
अब यहां से शुरू होता है लाभ लेने का खेल। थाना दोनो पक्षों से कहता है कि शनिवार को जनता दरवार में अपना अपना जमीन का कागजात लेकर आइये। पहला पक्ष अपना कागजात दरवार में पेश कर देता है। सीओ भी कहता है जमीन इन्ही का है दूसरा पक्ष दरवार में या तो पहुँचता या फिर नही पहुचता है।
थाना और सीओ पहले पक्ष को फिर अगले दरवार में आने को कहता है। पहला पक्ष पहुँचता है लेकिन दूसरा पक्ष फिर नही पहुचता है। यहीं से असली खेल शुरू होता है। थाना सीओ का कहना होता है दूसरा पक्ष नही आया तो हमलोग क्या करें। इतने कदम चलने के बाद जमीन धारी यानी पहला पक्ष का काफी जेब ढीला हो गया रहता है।अब थाना उस जमीन पर धारा 144 के लिए एसडीओ को रिपोर्ट कर देता है।
अनुभव कहता है कि दूसरा पक्ष धारा 144 का उलंघन कर कब्जा बाली जमीन पर घर बनाने लगता या फिर उपयोग में लाने लगता है।जब पहला पक्ष थाना को कहता है कि जमीन पर घर बना रहा है तो कहता ठीक है चौकीदार को भेजते है। लेकिन चौकीदार जाता नही है।
खेल इतने तक काफी फल फूल गया रहता है। अब थाना कहता है जमीन नापी कराओ। फिर पहला पक्ष अपने ही जमीन को नापी कराने के लिए सीओ को आबेदन देता है और नापी हेतु राशि जमा करता है । राशि जमा होने के महीनों बाद अमीन नापी के लिए आते है। नापी से पूर्व थाना द्वारा नोटिस दोनो पक्षों को हस्गत कराया जाता है।। (जारी)
सूत्रों का कहना है कि अमीन नापी से पूर्व पहला पक्ष से मोटी रकम वसूल करते है और नापी करते है नापी के बाद अमीन अपना रिपोर्ट सीओ को देते है।
फिर मामला यहाँ आकर रूक जाता है और आबेदन कर्ता प्रखण्ड का चक्कर लगाते लगाते थक जाता है। और तब आती है सामाजिक पंचायत की बारी ।दोनो पक्ष के समर्थक पंचायत में होते है इसलिये पंचायत नही होती है और मामला कोर्ट में चला जाता है। उसके बाद तारीख पर तारीख का चक्कर लगाता रहता है। दूसरा पक्ष तब तक थाना और सीओ को चढ़वा देकर घर तैयार कर लेता है। आबेदन कर्ता मूकदर्शक बना रह जाता है ।