दरभंगा । चेथरु महतो जनता महाविद्यालय, दोनवारीहाट, खुटौना, मधुबनी में मुंशी प्रेमचंद की 141 वीं जयंती प्रधानाचार्य डॉ० मो० रहमतुल्लाह के अध्यक्षता में मनाया गया। डॉ० मो० रहमतुल्लाह ने प्रेमचन्द पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक भारत के शीर्षस्थ साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की रचना दृष्टि साहित्य के विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुई है। उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख संस्मरण आदि अनेक विधाओं में उन्होंने साहित्य सृजन किया। वो अनेक विधाओं में शीर्षस्थ साहित्य सृजन के साधक थे।
अपने जीवनकाल में ही उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि मिल गई थी, किन्तु पाठकों के बीच आज भी उनका कहानीकार का रूप स्वीकारा व सराहा जाता है।उनका जीवन जितनी गहनता लिए हुए है, साहित्य के फलक पर उतना ही व्यापक भी है। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें तथा हजारों की संख्या में लेख आदि की रचना की। जिसमें कफन, गोदान एवं नमक का दारोगा, पूस की रात, ईदगाह व दो बैलों की कथा ने लोगों के दिलों और दिमागों पर गहरा भावनात्मक प्रभाव डाला। प्रेमचंद अपनी हर कृति को इतने समर्पित भाव से रचते कि पात्र जीवंत होकर पाठक के ह्रदय में धड़कने लगते थे। यहां तक कि पात्र यदि व्यथित हैं तो पाठक की पलक की कोर भी नम हो उठती। पात्र यदि किसी समस्या का शिकार है तब उसकी मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति इतनी प्रभावी होती है कि पाठक भी समाधान मिलने तक बेताबी का अनुभव करता है। वे स्वयं आजीवन जमीन से जुड़े रहे और अपने पात्रों का चयन भी हमेशा परिवेश के अनुसार ही किया। उनके द्वारा रचित पात्र होरी किसानों का प्रतिनिधि चरित्र बन गया।
प्रेमचंद एक सच्चे भारतीय थे। एक सामान्य भारतीय की तरह उनकी आवश्यकताएं भी सीमित थी। उनके कथाकार पुत्र अमृतराय ने एक जगह लिखा है ‘क्या तो उनका हुलिया था, घुटनों से जरा नीचे तक पहुँचने वाली मिल की धोती, उसके ऊपर कुर्ता और पैरों में बन्ददार जूते। आप शायद उन्हें प्रेमचंद मानने से इंकार कर दें लेकिन तब भी वही प्रेमचंद था क्योंकि वही हिन्दुस्तान हैं। ‘प्रेमचंद हिन्दी के पहले साहित्यकार थे जिन्होंने पश्चिमी पूंजीवादी एवं औद्योगिक सभ्यता के संकट को पहचाना और देश की मूल कृषि संस्कृति तथा भारतीय जीवन दृष्टि की रक्षा की।
सुमित्रानन्दन पंत के शब्दों में:- प्रेमचंद ने नवीन भारतीयता एवं नवीन राष्ट्रीयता का समुज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत कर गांधी के समान ही देश का पथ प्रदर्शन किया। प्रेमचंद भारतीयता के सच्चे प्रतीक थे। सशक्त प्रतिनिधि थे किन्तु यह हमारी वैचारिक दरिद्रता है कि हम उस युगपुरुष को याद भी करते हैं तो तब जब किसी स्तरहीन विवाद के चलते गोदान की प्रतियां जलाई जाती है।
मौके पर उपस्थित महाविद्यालय के सभी शिक्षकों ने अपने अपने विचारों को बड़े भावनात्मक रूप से मुंशी प्रेमचंद की कृति पर रखें।महाविद्यालय शिक्षक डॉ० धनवीर प्रसाद, डॉ० रमण कुमार राजेश, डॉ० संजय कुमार, डॉ० अमर कुमार, डॉ० भुवनेश्वर कुमार मण्डल, डॉ० विकास, डॉ० मीरा कुमारी, डॉ० अजित कुमार, डॉ० विनोद कुमार मण्डल, डॉ० दीपक कुमार रॉय, डॉ० कृष्ण देव कुमार भारती, डॉ० मन्नान, अमित कुमार, सरोज कुमार, विनोद कुमार, बलराम, बीरेंदर कुमार, राम दुलार व कुंदन क्रांति साथ ही महाविद्यालय के छात्र एवं छात्रा अमन, रोहन प्रेम व राहुल आदि उपस्थित थे।