प्रो० राज किशोर झा पूर्व कुलपति, लनामिवि दरभंगा के जन्म दिन पर बधाईयों का लगा तांता

दरभंगा।एक ऐसे व्यक्तित्व का जन्मदिन है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं, जो अर्थशास्त्र के विद्वान शिक्षक हैं, जिनका नाम देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री में शुमार है। जिनके जैसा शिक्षाविद वर्षों-बरस बाद सौभाग्य से किसी विश्वविद्यालय को प्राप्त होता है। जो मिथिला विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष भी रह चुके हैं, जो सामाजिक विज्ञान के संकायाध्यक्ष भी रह चुके हैं। वो कोई और नहीं मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो० राज किशोर झा हैं।
प्रो० झा का जन्म पतित पाविनी, जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी माँ गंगा के तट पर बसा बिहार के बेगूसराय जिला के बीरपुर प्रखंड के बीरपुर गाँव में 11 अगस्त 1952 को हुआ था। प्रो० झा के पिता का नाम प्रो० बम शंभू दत्त झा है, जो कि हिंदी के प्रकांड विद्वान हैं, जो मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जो बिहार हिंदी राष्ट्र भाषा परिषद के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं, जो सीनियर रिसर्च ऑफिसर रहे हैं।
वैसे तो प्रो० झा अर्थशास्त्र के सभी पेपर के विद्वान हैं, लेकिन जब वो पब्लिक फाइनेंस का लेक्चर लेते थे तो मानो बरसात भी अंबर से धरा पर उनके लेक्चर को सुनने के लिये आ जाता था। उनके लेक्चर के एक-एक शब्द की अपनी एक खास विशिष्ट पहचान था, जिसे सुन पाना छात्रों के लिये किसी बड़े सौभाग्य से कम नहीं होता था। उनका शिष्य आज देश-विदेश में बड़े-बड़े पदों पर विराजमान हैं। प्रो० झा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के राजभाषा विभाग द्वारा हिंदी में लिखित अर्थशास्त्र की पुस्तकों हेतु पुरुस्कार के लिये गठित कमिटी के भी अध्यक्ष रह चुके हैं।
कहा जाता है कि तकदीर भी विद्वानों व कर्मवीरों को ही साथ देता है। कुछ ऐसे विद्वानों व कर्मवीरों में शुमार का ही नतीजा यह हुआ कि उन्हें वरीयता के आधार पर मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति का 4 फरवरी 2017 को ताज मिला। फिर क्या था मिथिला विश्वविद्यालय में हिंदी चलचित्र “नायक” के सीएम “शिवाजी राव” के स्टाइल में कार्य शुरू हुआ। प्रथम दिन पूरा मिथिला विश्वविद्यालय राज किशोर झा के नारों से गूंज उठा। पहली बार “छात्रों व शोधार्थियों” के लिये कुलपति आवास का द्वार विधिवत चेकिंग के बाद खोल दिया गया ताकि छात्रों में बड़े पदों के सुविधा को देखकर उनमें भी बड़े अधिकारी बनने की ललक पैदा हो सके। मिथिला विश्वविद्यालय के इतिहास का सबसे बड़ा काम उन्होंने किया कि स्थानीय जुबली हॉल में छात्र-कुलपति प्रत्यक्ष संवाद कार्यक्रम की शुरूआत की। जहां मुख्यमंत्री के जनता दरबार के समान कुलपति का पूरा कैबिनेट हाजिर रहता था और तब छात्रों, शोधार्थियों, शिक्षकों, कर्मियों व छात्र नेताओं से प्रत्यक्ष संवाद करते थे और संबंधित अधिकारियों को त्वरित निदान का आदेश देते थे। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि मिथिला विश्वविद्यालय के इतिहास में लंबित मामलों में सबसे ज्यादा समाधान हुआ। महज अपने छोटे से अल्प कार्यकाल में उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी अंगीभूत महाविद्यालय का दौरा कर वहां के समस्याओं को परखा व समाधान की दिशा में कई कदम उठाया। शोधार्थियों के लिये तो मानो वो “अलादीन का चिराग” साबित हुए। सैकड़ों शोधार्थियों को उनके छोटे से कार्यकाल में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित होने का मौका मिला। क्योंकि शोधार्थियों व पेंशनरों को “लटकाओ व अटकाओ” पद्धति के जगह उन्होंने “संचिका को दौड़ाओ” पद्धति पर कार्य करना शुरू कर दिया था। उस समय कई प्रधानाचार्य, शिक्षक व कर्मियों जो वर्षों से निलंबित थे। उनके निलंबन मुक्ति के लिये कमिटी गठित कर त्वरित एक्शन लिया। जिसका परिणाम हुआ कि महज कुछ ही महीनों बाद सभी निलंबन मुक्त हुए। अपने इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने करीब सैकड़ों पेंशनरों की पेंशन फिक्स कर बुलेट रफ्तार से पेंशन शुरू करवाया। संबंद्ध महाविद्यालय के शिक्षक मद में विश्वविद्यालय में जमा ₹ 11.5 करोड़ की राशि होली से पहले निर्गत कर इतिहास रच दिया। सरकारी पैसे से कुलपति आवास पर उन्होंने होली मिलन समारोह मनाने पर रोक लगाने का निर्णय लिया। दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के कॉपी मूल्यांकन का लंबित राशि परीक्षक को उन्होंने तत्काल निर्गत कर दी। कर्मियों के साथ भी जुबली हॉल में संवाद कार्यक्रम की शुरुआत कर उनके समस्याओं का त्वरित निपटारा किया। मिथिला विश्वविद्यालय के जमीन पर अवैध अतिक्रमणकारियों से निपटने के लिये स्वयं ग्राउंड जीरो पर पहुंचते थे। कई महाविद्यालयों का औचक निरीक्षण कर कैश बुक में अनियमितता पर कड़ी फटकार लगाया। प्रधानाचार्य को सप्ताह में कम से कम स्वयं नियमित 5 क्लास करने का उन्होंने आदेश दिया। उनका स्पष्ट आदेश था कि कुलसचिव, कुलानुशासक, छात्र कल्याण अध्यक्ष व परीक्षा नियंत्रक को छोड़ सभी अधिकारी सबसे पहले अपना क्लास लेंगे तब अपने कार्यालय जाएंगे। उनके कुलपति के कार्यकाल में सबसे अनोखा एक रिकॉर्ड दर्ज हुआ कि एक भी “छात्र आंदोलन” नहीं हुआ। छात्र नेताओं से संवाद स्थापित कर उनके समस्याओं पर बखूभी काम किया। विश्वविद्यालय के स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएच०डी० की मूल उपाधि व मूल प्रमाण पत्र को न्यूनतम से न्यूनतम दिन में निर्गत कर छात्रों व अभिभावकों के दिल में जगह बना लिया। यही वजह रही कि जब वो कुलपति के पद से हटे तो हर आंखें नम थी। चारों ओर मायूसी छा गयी, अचानक एक गजब का सन्नाटा सा माहौल दिखने लगा था। चारों तरफ एक ही आवाज सुनाई देती थी कि काश “राज किशोर बाबू” पूरे टर्म भर कुलपति रहते तो मिथिला विश्वविद्यालय कब का एक जीवंत पटकथा लिख दिया होता। उन्होंने नायक चलचित्र के सीएम “शिवाजी राव” के स्टाइल में काम कर महज कम ही दिनों में मिथिला विश्वविद्यालय के इतिहास में अपने कुलपति का कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिख दिया।

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