विश्वविद्यालय भूगोल विभाग द्वारा “पशु संसाधन” महत्व, क्रूरता एवं कल्याण” विषय पर आमंत्रित व्याख्यान आयोजित।

विश्वविद्यालय भूगोल विभाग द्वारा “पशु संसाधन” महत्व, क्रूरता एवं कल्याण” विषय पर आमंत्रित व्याख्यान आयोजित।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर भूगोल विभाग के तत्वावधान में “पशु संसाधन : महत्ता, क्रूरता एवं कल्याण” विषय पर आमंत्रित व्याख्यान आयोजित किया गया, जिसमें सुजीत कुमार चौधरी, डा अनुरंजन, डा आर एन चौरसिया, डा मनुराज शर्मा, डा रश्मि शिखा, डा ममता स्नेही तथा डा सुनील कुमार सिंह आदि ने महत्वपूर्ण विचार रखें। व्याख्यान में 60 से अधिक विभागीय छात्र- छात्राओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया ।

मुख्य वक्ता के रूप में अपने व्याख्यान में जनचेतना अभियान और आंदोलन अनुसंधान संस्थान, पटना के कार्यकारी अध्यक्ष सह सोशल एक्टिविस्ट सुजीत कुमार चौधरी ने कहा कि शाकाहार भोजन ही मानव का प्राकृतिक एवं वास्तविक भोजन है। इंसानियत के नाते हमें पशुओं से स्नेह करना चाहिए। युवाओं से बदलाव की ज्यादा उम्मीद की जाती है। जनजागरूकता, सामाजिक जिम्मेदारी तथा पशुओं के प्रति संवेदनशीलता से उनके प्रति क्रूरता को रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम- 1960 की धारा 428 एवं 29 के अंतर्गत 7 वर्ष की सजा तथा आर्थिक दंड का प्रावधान है। पशु क्रूरता निवारण समिति 2001 में गठित की गई थी। सभी जिला में गठित समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी, उपाध्यक्ष जिला पुलिस पदाधिकारी तथा सचिव जिला पशुपालन पदाधिकारी होते हैं।

भूगोल के प्रभारी विभागाध्यक्ष डा अनुरंजन ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि पशु हमारे महत्वपूर्ण संसाधन हैं। अनेक देशों की आमदनी का महत्वपूर्ण संसाधन पशु ही है। बेजुबान पशु हमेशा मानव कल्याण करते हैं, जिनके प्रति हमें संवेदना रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि मनुष्य ने 9 हजार वर्ष पूर्व कुत्ता को पहला पशु बनाया था। फिर घोड़ा, गाय आदि को भी पालतू पशु बनाया गया। सड़कों एवं खेतों में आवारा घूमने वाले पशुओं के प्रति अधिक क्रूरता की जाती है।

विशिष्ट वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय के संस्कृत- प्राध्यापक डा आर एन चौरसिया ने कहा कि व्याख्यान का विषय महत्वपूर्ण एवं समसामयिक है। हम पशुओं से अनेक तरह के लाभ लेते हैं तो उनका समुचित देखरेख करना भी हमारा कर्तव्य बनता है। सभ्य सामाजिक प्राणी के रूप में सामाजिक जागरूकता के बल पर हम पशु- क्रूरता को रोक सकते हैं। हमारी धर्म- संस्कृति एवं साहित्य में “अहिंसा परमो धर्म:”तथा गाय को माता मानते सहित अनेक पशु- पक्षियों को देवताओं के वाहन के रूप में वर्णन कर उनकी महत्ता एवं उनके प्रति कल्याण की भावना दर्शायी गई है। व्याख्यान में संस्कृत- प्राध्यापिका डा ममता स्नेही आदि ने भी विचार रखें।

छात्र- छात्राओं की ओर से विषय से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे गए, जिनका समुचित उत्तर विशेषज्ञों के द्वारा दिया गया। विभागीय प्राध्यापक डा मनुराज शर्मा के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में अतिथि स्वागत डा रश्मि शिखा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा सुनील कुमार सिंह ने किया।

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