देवभाषा संस्कृत प्राचीन, सर्वाधिक शुद्ध, समृद्ध एवं नौकरी व रोजगार देने वाली भाषा: डॉ० घनश्याम।

दरभंगा: शिक्षा की सार्थकता तभी होती है, जब छात्र व्यवहार कुशल बन सकें। नियमित रूप से वर्ग में उपस्थित होने वाले छात्र न केवल शिक्षा ग्रहण करते हैं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी सीखते हैं। लक्ष्य प्राप्ति हेतु कठिन परिश्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। यदि छात्र पूरे उत्साह एवं मनोयोग से श्रम करें तो सफलता अवश्य ही मिलेगी। उक्त बातें विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग द्वारा “संस्कृत- अध्ययन में नौकरी एवं रोजगार की संभावनाएं” विषयक विचारगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डा घनश्याम महतो ने कही।

उन्होंने कहा कि देवभाषा संस्कृत प्राचीन, सर्वाधिक शुद्ध, समृद्ध एवं नौकरी व रोजगार देने वाली भाषा है। युवाओं में अपार शक्ति विद्यमान है, जिसका उपयोग स्वयं को सफल बनाने तथा समाज के लिए उपयोगी बनने में करना चाहिए। विभागाध्यक्ष ने छात्रों का आह्वान किया कि वे लक्ष्य प्राप्ति हेतु समय- प्रबंधन करते हुए नियमित रूप से पुस्तकालय का भी उपयोग करें।
विभागीय प्राध्यापक डा आर एन चौरसिया ने कहा कि अमृतवाणी संस्कृत मानवता की आधारशिला तथा जीवन जीने की कला सिखाने वाली अमर भाषा है। यह भारतीय संस्कृति तथा मानव- संस्कार का मूल स्रोत है। यदि संस्कृत साहित्य में बताए मार्गों का अनुसरण करें तो समाज की अधिकांश समस्याएं स्वत: समाप्त हो जाएंगी। संस्कृत- अध्ययन से सरकारी नौकरी के अलावे शिक्षण, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तु विज्ञान, यौगिक साइंस, कर्मकांड एवं धार्मिक आदि क्षेत्रों में प्रतिष्ठा के साथ धनार्जन किया जा सकता है।

स्वागत एवं संचालन करते हुए विभागीय प्राध्यापिका डा ममता स्नेही ने कहा कि संस्कृत का अध्ययन कोई भी गरीब- अमीर अथवा किसी भी वर्ग- संप्रदाय का व्यक्ति आसानी से कम खर्च में कर सकता है। उन्होंने बताया कि संस्कृत के छात्र सेना, पत्रकारिता, फिल्म, चिकित्सा, कथावाचक, पुरोहित व अनुवादक के साथ ही नासा में विशेषज्ञ आदि के रूप में रोजगार प्राप्त कर सकता है।
विषय प्रवेश कराते हुए संस्कृत- प्राध्यापिका डा मोना शर्मा ने कहा कि संस्कृत भारत की ज्ञान- विज्ञान की विरासत है, जिसका लाभ आज पूरे विश्व को मिल रहा है। यह किसी वर्ग विशेष की नहीं, बल्कि सभी समुदायों की भाषा है। इससे सिर्फ सरकारी नौकरी व रोजगार ही नहीं, वरन संस्कारित श्रेष्ठ मानव बनने की इच्छा भी पूरी होती है।

इस अवसर पर शोधार्थी सोनाली मंडल, अंतरराष्ट्रीय महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्र मंजीत कुमार चौधरी, कंचन कुमारी, अतुल कुमार झा, अंकिता कुमारी, सतीश कुमार चौरसिया, भार्गवी भारती, राजा कुमार पासवान, स्मिता कुमारी, विवेक कुमार आदि ने भी विचार व्यक्त किए। वहीं मंजू अकेला, विद्यासागर भारती, योगेन्द्र पासवान तथा उदय कुमार उदेश आदि ने कार्यक्रम में सराहनीय योगदान किया।

दीक्षारंभ कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में डा आरएन चौरसिया तथा डा ममता स्नेही के नेतृत्व में नव नामांकित छात्र- छात्राओं ने मिथिला विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय तथा संस्कृत विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय में जाकर पदाधिकारियों एवं कर्मियों से परिचय करते हुए उपलब्ध पुस्तकों, अध्ययन की व्यवस्था एवं वहां के नियमों आदि की जानकारी प्राप्त की, ताकि आगे वे वहां जाकर नियमानुसार सुगमता पूर्वक अध्ययन कर सकें। वहीं सभी छात्र- छात्राओं ने मिथिला विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय की सदस्यता लेने हेतु फोर्म प्राप्त किया।

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