चमकी बुखार से सबंधित जानकारी व चिकित्सा के लिए डीएमसीएच में बनाया गया कंट्रोल रूम

चमकी बुखार से सबंधित जानकारी व चिकित्सा के लिए डीएमसीएच में बनाया गया कंट्रोल रूम

 

दरभंगा । लीची के मौसम आने के साथ बच्चों में चमकी बुखार की धमक सुनाई देने लगती है। इस वर्ष स्वास्थ्य विभाग में पहले से चमकी बुखार के मरीजों की समुचित चिकित्सा के लिए कमर कस ली है। इस सिलसिले में राज्य स्वास्थ्य समिति ने चमकी बुखार के संभावित इलाकों के सरकारी अस्पतालों और सारे मेडिकल कॉलेज में पीआईसीयूकी चाक-चौबंद व्यवस्था करने का आदेश दिया है। अन्य जिला अस्पतालों की तरह 24 घंटे कार्यरत कंट्रोल रूम की व्यवस्था दरभंगा मेडिकल कॉलेज में भी की गई है। वर्तमान में इस कंट्रोल रूम को स्वास्थ्य प्रबंधक चंद्रलेखा कुमारी देख रही हैं और 95079 73901 कंट्रोल रूम का नंबर घोषित किया गया है। इस सिलसिले में डॉ विजय प्रकाश राय, कार्यक्रम प्रबंधक, शिशु स्वास्थ्य बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के निर्देश पर शिशु विभाग में एईएस के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। विभागाध्यक्ष शिशु सह प्राचार्य डॉक्टर के एन मिश्रा विभाग, पीकू के इंचार्ज डॉक्टर एन पी गुप्ता, एइएस के नोडल ऑफिसर डॉक्टर मनीशंकर तथा डॉक्टर ओम प्रकाश ने संयुक्त रुप से शिशु विभाग के पीजी छात्रों तथा सीनियर रेजिडेंट को एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया। कार्यक्रम में डॉ अमित कुमार, डॉक्टर अंजुम इकबाल, डॉक्टर चंदन मिश्रा, डॉक्टर रणधीर मिश्रा इत्यादि ने भाग लिया।

चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों को रात में खिलाना बेहतर

चिकित्सको ने कहा किसी भी बच्चे में पांच-सात दिन के बुखार के साथ मानसिक स्थिति पहले से कमतर हो गई हो या उसे चमकी आ गया हो और उसमें पहले से कोई मस्तिष्क संबंधी रोग ना हो तो उसे चमकी बुखार की श्रेणी में रखा जाता है।  लीची बेल्ट के गरीब बच्चों में सही समय पर भरपेट भोजन ना मिलना और कच्ची-अद्ध पक्की लीची खाना ग्लूकोज की कमी सबसे बड़ा कारण समझ में आया है, इसलिए जो भी बच्चे भर्ती होंगे, उन्हें सबसे पहले स्थिर अवस्था में लाने के साथ ब्लड ग्लूकोज, सिरम इलेक्ट्रोलाइट और सीएसएफ एग्जामिनेशन की व्यवस्था की गई है। चमकी बुखार से बचाव के लिए बच्चों को रात में खिलाकर सुलाना और उन्हें रात में भी उठा कर खिलाना लाभदायक पाया गया है।

एईएस की जांच के लिए कर ली गई व्यवस्था

डॉ के एन मिश्रा ने बताया कि वर्तमान में पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभाग में ए इ एस के जांच की संपूर्ण व्यवस्था पूरी कर ली गई है, अतः मरीजों के आने के साथ उनकी जांच करा ली जाए और प्रोटोकॉल के अनुसार इलाज शुरू कर दिया जाए। डॉ मनीशंकर ने बताया कि ए इ एस मरीजों के इलाज के साथ उनकी अन्य जानकारी सही ढंग से नोट करना और उन्हें ससमय सरकार को फॉर्मेट में रिपोर्ट करना आवश्यक है। इसलिए मरीज के संपूर्ण जांच की रिपोर्ट शीर्ष शैय्या टिकट में अवश्य नोट किया जाना है। डॉक्टर एनपी गुप्ता ने एइएस के मरीजों की इलाज की व्यवस्था, जैसे बुखार के लिए पेरासिटामोल देना,चमकी के लिए डायजेपाम और अन्य दवाई देना, हाइपोग्लाइसीमिया को ग्लूकोस इन्फ्यूजन देकर कंट्रोल करना, मेनिनजाइटिस में एंटीबायोटिक और सेरेब्रल मलेरिया में मलेरिया की दवाओं को देने के बारे में बताया। डॉक्टर ओम प्रकाश ने बताया की किसी भी मरीज में सांस की प्रक्रिया, दिल का धड़कन, शरीर में रक्त प्रवाह, और मस्तिष्क के कार्य करने की स्थिति और चमकी को शुरू से ध्यान रखा जाए तो बच्चों में मृत्यु को रोका जा सकता है। अंत मे नोडल डॉ हेमंत कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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