उद्धारक की बाट जोह रहा झझरी सिरुआ सड़क, सपना हुआ चूर चूर, आश्वासनों से थक चुके हैं लोग

झझरी सिरुआ सड़क पर चलना मुश्किल है। मूसलाधार बारिश से गांव की सड़कें जल मग्न हो चुकी है। कहना मुश्किल कि सड़क में गढढा है या गढढे में सड़क। दर्जनों गांव को जोड़ने वाली यह सड़क अपने किस्मत को कोस रही है।
आजादी के 70 साल बाद भी ये सड़क अपने उद्धारक की बाट जोहते जोहते थक चुका है। इस सड़क पर चलने वाले लोग इसकी दुर्दशा को अब अपना नियति मान चुके हैं। विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बजने से पूर्व तत्कालीन विधायक ने बड़ी ताम झाम से झझरी चौक पर झझरी सिरुआ उज्जैना सड़क की शिलान्यास किया।
सिरुआ के लोगों में इतनी खुशी हुई कि तत्कालीन विधायक को सिरुआ में भव्य स्वागत किया गया। लेकिन खुशी अब निराशा में बदलती जा रही है। शिलान्यास के एक वर्ष बीत गया लेकिन अब तक सड़क पर एक चुटकी मिट्टी नही डाला गया है।

बताते चलें कि साल भर सरकार गांव की झूठे विकास का ढोल पीटते रहती है,और हर वर्ष बरसात में उसका दावा टाय टाय फीस हो जाता है ।
लगभग प्रत्येक वर्ष बरसात में फसल का डूबना, गाँवों एवं घरों में पानी भर जाना ,जान माल की क्षति होना आम बात है।
चुनाव के समय के दावे वादे सरकार के घोषणा पत्रों में ही सिमट कर रह जाता है ,इस बात का जीता जागता उदाहरण है बहेड़ी प्रखण्ड क्षेत्र के झझरी सिरुआ सड़क। दूसरा उदाहरण है बलीगांव पंचायत के सिरुआ गांव के मुख्य सड़क पर तीन फीट जमा पानी। तीसरा उदाहरण है निमैठी पंचायत के चक्का गांव की मुख्य सड़क जहाँ सालों भर जल जमाव रहता है। यही है गांव की विकास।
चौथा उदाहरण है बलीगांव गांव की मुख्य सड़क जँहा बरसात के शुरु होते ही यह सड़क नालों का रूप ले लेता है।
कारण साफ है सड़क तो बना दिये जाते है लेकिन नाला निर्माण नही किया जाता है । बरसात की मौसम में लोग कैसे सफर करे यही प्रश्न बन पहाड़ की तरह खड़ा है।

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