प्राचीन काल से ही मिथिला का क्षेत्र तंत्र साधना का केंद्र रहा है

– राजीव कुमार झा –

दरभंगा । प्राचीन काल से ही मिथिला का क्षेत्र तंत्र साधना का केंद्र रहा है कई ऐसे स्थल हैं जो सिद्धपीठ के रूप में विख्यात हैं। इनमें दरभंगा जिले के मनीगाछी प्रखंड के भंडारिसम -मकरंदा गांव स्थित वाणेश्वरी भगवती बालिका से भगवती रूप ले लेने के कारण प्रसिद्ध बन चुकी है वाणेश्वरी भगवती की विख्यात मिथिलांचल भर में है सालों घर यहां साधक अपनी मनोवांछित कामनाओं को लेकर आते जाते रहते हैं कई साधक का कहना है कि वाणेश्वरी भगवती से मन से मांगी गई मुरादे निश्चित रूप से पूरी होती हैशक्तिपीठ के रूप में अलग ही महत्व है मान्यता है कि सच्चे मन से जो इनके दर माथा टेकता है वह खाली हाथ नहीं लौटता है माँ सबकी मनोकामनाएं पूरी करती है चदुर्दीक गांव से लगभग सात से दस फीट की ऊंचाई पर स्थित
वाणेश्वरी परिसर को स्थानीय लोग डीह कहते हैं कुछ विद्वान इसे कनाट वंशीय के शासकों के प्रशासकीय स्थल के रूप में इस डीह की चर्चा करते हैं जबकि कुछ विद्वान राजा शिव सिंह के गढ़ के रूप में इस स्थल का संबंध मानते हैं इस डीह के इर्द-गिर्द बड़े-बड़े तालाबों का पाया जाना इस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है पाल कालीन देवी वाणेश्वरी के संबंध में कहा जाती है कोलिक पुजारी मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल के दौरान शासक वर्ग के अत्याचार ममाहत कवि वाण झा की अति सुंदरी पुत्री वाणेश्वरी प्रतिरोधात्मक स्वभाव से जोड़कर प्रस्तर रूप में प्रमाणित होने की कथा कहते हैं कुछ लोग अपने पूर्वजों से सुनी बातें को उद्धत करते हुए मुगलकालीन शासनकाल में बाणभट्ट नामक हिंदू वीर पुरुष की सुपुत्री के रूप में वाणेश्वरी के जन्म लेने एवं उनकी सुंदरता रूप की चर्चा सुनकर बलपूर्वक उठाने के क्रम में प्रस्तर धारण कर लेने के तत्व की चर्चा करते हैं मंदिर से सटे पूरब दिशा के तालाब से देवी वाणेश्वरी की मूर्ति का निकलना तो सत्य है ग्रामीणों ने इस डीह पर पीपल के पेड़ के नीचे मूर्ति को स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू किया कई भक्तों को अपनी इच्छा के अनुरूप फल की प्राप्ति भी हुई इसके प्रमाण के रूप में वर्तमान मंदिर का निर्माण जुड़ा हुआ है दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की पत्नी महारानी लक्ष्मी देवी की पूजा अर्चना कर देवी से रामबहादुर श्री नाथ मिश्र के पुत्र प्राप्ति की याचना की मन्नत पूरी होने पर इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण 1872 ई, करवाया जो आज अपने वर्तमान स्वरूप में मौजूद है मंदिर में स्थापित भगवती समेत परिसर में रखे काले पत्थर की मूर्ति अपने आप में ऐतिहासिक तत्वों को समेटे हुए हैं पुरातत्विक महत्व की दृष्टि से इस स्थल का विशेष महत्व हो सकता है वाणेश्वरी स्थान की मूर्तियों की बनावट तथा पत्थर की पहचान से निर्धारण भी संभव हो सकता है प्राचीन मूर्तियों के अलावा इस स्थल के गर्भ में प्राचीन काल की इतिहास सिमटी हुई है सड़क निर्माण के क्रम में चिति कौड़ी से भरा हुआ विशाल काला मटका सहित अनेक ऐसी वस्तुएं मिली है जो हजारों वर्ष के इतिहास को दर्शाता है शारदीय नवरात्र एवं रामनवमी में तो यहां का दृश्य देखते ही बनता हजारों कावड़िया सिमरिया से गंगाजल लाकर यहां जलाभिषेक करते हैं वाणेश्वरी न्यास समिति के अध्यक्ष डॉ राम मोहन झा व संयोजक संजीव कुमार झा ने बताया कि वाणेश्वरी स्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए पर्यटन विभाग के द्वारा 65 लाख की लागत से भवन निर्माण का कार्य किया गया यहां की एक प्रमुख मांगों में से एक मांग है। कि पर्यटन विभाग के सांस्कृतिक कैलेंडर की सूची में वाणेश्वरी महोत्सव को शामिल किया जाए वही संजीव कुमार झा ने जानकारी दी कि इस कतार में बिहार सरकार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने भी बिहार सरकार के पर्यटन मंत्री को पत्र भेजकर वाणेश्वरी महोत्सव
को पर्यटन विभाग के सांस्कृतिक कैलेंडर की सूची में महोत्सव को शामिल करने के लिए पर्यटन विभाग को पत्र लिखकर अवगत करवाया पूर्व पर्यटन मंत्री जिबेश मिश्रा ने वाणेश्वरी न्यास समिति को पत्र लिखकर अवगत करवाया की जल्द ही पर्यटन विभाग के सांस्कृतिक कैलेंडर में वाणेश्वरी महोत्सव को शामिल किया जाएगा ।

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