दरभंगा। इतिहास गवाह है कि सिर्फ विद्वता के बल पर आप किसी महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक तरक्की नहीं कर सकते हैं। बल्कि विद्वता के साथ-साथ प्रशासन कैसे चलता है इसका भी गुर शिक्षकों को पता होना चाहिये। हमारे विश्वविद्यालय के पास पुराने जितने शिक्षक थे उसमें अधिकांश के पास महाविद्यालयों व विश्वविद्यालय को आगे बढ़ाना का हुनर पता था। लेकिन वैसे सभी 95% शिक्षक सेवानिवृत्त हो चुके हैं और जो 5% बचे हैं वो आनेवाले 5 सालों में सेवानिवृत्त हो जायेंगे। फिर सारी जवाबदेही नये शिक्षकों के पास आ जायेगी। ऐसे में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालय के विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों के सामने जो निकट भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती आनेवाली है वो है विभागों में शैक्षणिक माहौल के साथ-साथ वर्ग का अनुशासन व कानून व्यवस्था?
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि महाविद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालय के विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों तक ऐसे छात्र, छात्रा व शोधार्थी पहुंचते हैं जो कि किशोरावस्था में होते हैं। युवावस्था एक ऐसा उम्र होता है जिस अवस्था में छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों में सबसे ज्यादा कुछ भी कर जाने का जोश व जुनून होता है क्योंकि स्कूली लाइफ से निकलकर छात्र-छात्रा कॉलेज लाइफ में आता है। 18 से 25 वर्ष का ये उम्र छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों के जीवन को संवारने का उम्र होता है। जहां शिक्षकों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। उस समय शिक्षक ‘कुम्हार, सोनार व लोहार” की भूमिका में होता है। उस समय शिक्षक को बड़े सावधानी से छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को गढ़ना होता है व खुद भी तपना होता है। अगर उस समय छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को अगर शिक्षक गढ़ने व सकारात्मक दिशा प्रदान कर पाने में कामयाब हो जाते हैं तो यकीनन वो आनेवाली पीढ़ी को एक अच्छा नागरिक प्रदान करते हैं और अगर शिक्षक नाकामयाब होते हैं तो छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों का लाइफ विफल हो जाता है और नकारात्मक दिशा में आगे बढ़ जाता है। जिसका बाद में चलकर छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को भी अफसोस होता है। लेकिन उसके बाद उसे हाथ मलने के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं होता है। सर्वे रिपोर्ट यह बताता है कि कई छात्र-छात्रा व शोधार्थी कहते दिख जाते हैं कि मेरे से बड़ी भूल हो गयी। शिक्षक भी हमको उस समय समझा नहीं पाये। शिक्षक हमें क्या हरकायेगा व डरायेगा। हमलोग ही शिक्षकों को हरकाते व डराते थे। सच्चाई यह है कि छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों की भी गलती नहीं होती है। बल्कि यह उसके उम्र के उस युवा पड़ाव की सबसे बड़ी गलती होती है जहां कई छात्र-छात्रा व शोधार्थी सही गलत का फैसला नहीं कर पाते हैं। वो उस अबोध बालक के समान होता है जो बच्चे में जलते हुए लालटेन को छूने जाते थे और हाथ जल जाता था। इसी भविष्य को जलने से बचाने के लिये शिक्षकों की एक अहम भूमिका होती है और वो उस छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों के भविष्य को तभी संवार सकते हैं जब विभिन्न विभागों में विद्वता के साथ-साथ प्रशासनिक क्षमता वाले शिक्षकों व कम से कम एक महिला शिक्षकों का समायोजन हो सके, क्योंकि छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को ज्ञान व सही-गलत के निर्णय की समझ को मार्गदर्शित करना ही शिक्षकों का सबसे बड़ा कर्तव्य है।
कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि छात्राएं खुलकर अपनी समस्याएं पुरुष शिक्षकों के पास नहीं रख पाते हैं। इसीलिए हर विभागों में कम से कम एक महिला शिक्षकों का भी समायोजन किया जाना चाहिये।
दरअसल होता यह है कि शिक्षक तो शिक्षक होते ही हैं। किसी शिक्षक के विद्वता पर हमें कोई शक नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि उस समय कई शिक्षक, छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों से डरते नजर आते हैं। फिर आपकी विद्वता कोई काम की नहीं रह जाती है।
इसीलिए अगर महाविद्यालय व विश्वविद्यालय पीजी विभागों को नम्बर 1 बनाना हो तो विश्वविद्यालय प्रशासन में नीति-निर्माताओं की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। आनेवाले 24 अगस्त 2021 को ट्रांसफर कमिटी की मीटिंग प्रस्तावित है। मैं कुलपति प्रो० सुरेंद्र प्रताप सिंह, प्रतिकूलपति प्रो० डॉली सिन्हा, कुलसचिव प्रो० मुश्ताक अहमद, उप कुलसचिव द्वितीय प्रो० दिव्या रानी हंसदा व आदरणीय ट्रांसफर कमिटी के सभी सदस्यों व सभी संबंधित विभागाध्यक्षों से यह विनम्र अपील करना चाहता हूं कि विभिन्न विभागों में विद्वान, प्रशासनिक क्षमता वाले शिक्षकों के साथ-साथ एक महिला शिक्षक का समायोजन वन टू वन एक छोटा सा साक्षात्कार के आधार पर करना चाहेंगे ताकि उनके विद्वता व प्रशासनिक क्षमता की जानकारी मिल सके और कम से कम 1-1 सभी विभागों को एकेडमिकली स्ट्रांग, प्रशासनिक क्षमता वाले व महिला शिक्षक भी मिल सके ताकि हर विभागों में अनुशासन बना रहे और छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों का सर्वांगीण विकास हो सके और भारत को विश्व गुरु बनाने में छात्र-छात्रा व शोधार्थी अपनी अहम भूमिका निभाये।