संस्कृत भाषा में व्याकरण का महत्त्व विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का हुआ आयोजन

दरभंगा। संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा द्वारा १९ से २५ अगस्त २०२१ तक मनाये जा रहे संस्कृत सप्ताह महोत्सव के क्रम में दूसरे दिन आज शुक्रवार को संस्कृतभाषायां व्याकरणस्य महत्त्वम् अर्थात् संस्कृत भाषा में व्याकरण का महत्त्व विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया | कार्यक्रम ऑन लाईन ज़ूम एप्प पर किया गया। इस अवसर पर कामेश्वरसिंह-दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय प्रो. शशिनाथ झा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्कृत भाषा में व्याकरण के महत्त्व को प्रकाशित करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा में व्याकरण का यही महत्त्व है कि हज़ारों वर्ष पूर्व की संस्कृत भाषा आज भी उसी रूप में हमें उपलब्ध है | व्याकरण का ही प्रभाव है कि कालिदास आदि के युग के समान आज भी संस्कृत भाषा में काव्य आदि ग्रन्थों की रचनाएँ हो रही हैं। उन्होने आगे कहा कि आधुनिक युग में आधुनिक उपकरणो का ज्ञान भी अत्यावश्यक है।लोगों का आकर्षण संस्कृत के प्रति है। किन्तु जनसामान्य में यह भावना फैली हुई है कि यह भाषा कठिन है। वास्तव में यह यह बहुत सरल और मधुर भाषा है। संस्कृत को व्यवहार और पठन विधि से सरल किया जा सकता है। कठिन तो इन्जीनियरिंग, मेडिकल आदिआदि विषयों की पढ़ाई क्या कठिन नहीं है?
सत्र के विशिष्ट वक्ता के रूप में वाराणसी में संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो. ब्रजभूषण- ओझा, जो बादरायण व्यास पुरस्कार से सम्मानित हैं, राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में सहायक-आचार्य के रूप में अध्यापन कर चुके हैं को आमन्त्रित किया गया था। उन्होंने अपने व्याख्यान में मिथिला का संस्कृत में योगदान का स्मरण करते हुये कहा कि शास्त्रों की परिष्कारशैली और व्याख्याशैली यहाँ के विद्वानों की अभूतपूर्व रही है| संस्कृत भाषा तीन प्रकार की है १- जो वेद में प्रयुक्त है | 2- दूसरी जो विद्वानों द्वारा बोली जाती है| ३- जो सामान्य जन द्वारा बोली जाती है| यद्यपि व्याकरण के अभ्यास के विना भी अन्य भाषाओं की तरह संस्कृत भाषा भी हम बोल सकते हैं, लेकिन संस्कृत में आने वाली विकृतियों को विना व्याकरण के न तो समझा जा सकता है और न ही उन्हें दूर ही किया जा सकता है। वैसे संस्कृत में अनेक व्याकरण हैं, लेकिन आज संस्कृत व्याकरण के रूप में पाणिनीय व्याकरण ही सर्वाधिक मान्य है। पाणिनीय व्याकरण की ही देन है कि आज भी भी संस्कृत भाषा सुरक्षित है और इसमें व्यापकता बनी हुई है | व्याकरण की सहायता से हम आधुनिक शब्दों का निर्माण कर सकते हैं| जैसे कि कम्प्यूटर के लिये सङ्गणकशब्द । उन्होंने व्याकरण का महत्त्व बताते हुये कहा कि किसी भी शास्त्र में प्रवेश पाने के लिये पहले व्याकरण का ज्ञान होना चाहिये | उन्होंने कहा विशिष्ट पाण्डित्य के लिए सबसे पहले व्याकरण, तब न्याय और उसके बाद मीमांसा पढकर इसके बाद ही अन्य शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिये| व्याकरण के तीन पक्ष हैं १ प्रक्रिया 2. परिष्कार ३ दर्शन | तीनों में से उन्होंने परिष्कार पक्ष पर जोर दिया | अपने व्याख्यान में उन्होंने कई बार मिथिला के शास्त्रीय व्याख्या की प्रशंसा की|
आज के सत्र का प्रारम्भ स्नातकोत्तर धर्मशास्त्र विभाग के प्राचार्य प्रो.दिलीप कुमार झा पूर्व  सी सी डी सी के द्वारा स्वागत भाषण से किया गया। इस अवसर पर धन्यवाद ज्ञापन स्नातकोत्तर व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश शर्मा के द्वारा किया गया | सत्र का संयोजन स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के सहायक-प्राचार्य डा. वरुण कुमार झा के द्वारा किया गया | आज के कार्यक्रम में संपूर्ण संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम के आयोजक छात्र-कल्याणाध्यक्ष एवं स्नातकोत्तरव्याकरण साहित्य संकायाध्यक्ष प्रो. सुरेश्वर झा के साथ ही कई पदाधिकारी, अध्यापक, शोधछात्र, छात्र, छात्राएं, और संस्कृत प्रेमी भी उपस्थित थे ।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *