दरभंगा: विश्वविद्यालय मैथिली विभाग में विभागाध्यक्ष प्रो. दमन कुमार झा की अध्यक्षता में एक शोक सभा का आयोजन किया गया।
ज्ञात हो कि विगत् 18 अक्टूबर को मैथिली साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान एवं मूर्द्धन्य साहित्यकार पंडित गोविन्द झा का निधन हो गया था। विभागाध्यक्ष प्रो. झा ने पंडित जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत रूप से अपनी बातों को रखा। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि पं. गोविन्द झा का जीवन जीने की जिजीविषा ही हम सबों के लिए बड़ी प्रेरणा है। शतायु प्राप्त पंडित जी अपने जीवन के लगभग 95 वर्षों तक मैथिली साहित्य में रचते-बसते-रमते रहे। इसी का परिणाम है कि वे अपने पाठकों के बीच करीब पाॅंच दर्जन पुस्तकें छोड़ गए जिससे अनन्त काल तक जिज्ञासु पाठक लाभान्वित होते रहेंगे। ‘सामाक पौती’, ‘अन्तिम प्रणाम’, ‘लोढानाथ’, ‘राजा शिवसिंह’, ‘विद्यापतिक आत्मकथा’, ‘उमेश मिश्र’, ‘गोविन्द दास’, ‘लघुविद्योतन’, ‘मैथिली उद्भव ओ विकास’, ‘उच्चतर मैथिली व्याकरण’, ‘मैथिली भाषा का विकास’, ‘नेपाली साहित्यक इतिहास’अनुदित, ‘अओ बाबा की बौआ’, आदि इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।
विभागीय वरीय शिक्षक प्रो. अशोक कुमार मेहता ने कहा कि गोविन्द झा एक बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्तित्व थे। पारम्परिक एवं आधुनिकता के बीच उन्होंने एक अद्भुत संतुलन बनाया। वे कई प्रतिष्ठित सम्मान एवं पुरस्कारों से नवाजे गये थे जिनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ग्रियर्सन पुरस्कार, प्रबोध साहित्य सम्मान, ज्योतिरीश्वर रंग-शीर्ष सम्मान, चेतना समिति सम्मान आदि प्रमुख है। साहित्य के लगभग प्रत्येक विधा में इन्होंने रचनाएं की। मैथिली, हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, प्राकृत, पाली सहित कई भाषाओं पर उनका एकाधिकार था। उनका जाना मैथिली साहित्य के लिए एक अत्यन्त अपूर्णीय क्षति है। इस मौके पर प्रो. रमेश झा, डाॅ. सुरेश पासवान, डाॅ. सुनीता कुमारी, प्रमोद कुमार पासवान, विभागीय कर्मी भाग्यनारायण झा, विभागीय शोधार्थी सत्यनारायण, रौशन, दीपक, हरेराम, भोगेन्द्र, बंदना, नीतू, राज्यश्री, शालिनी, दीपेश, राजनाथ, पवन, मनीष, गुड्डू, प्रवीण, प्रियंका समेत गुड्डू, ज्ञानी, गजेन्द्र, नीतिश, बेबी, पूजा, जानकी, लक्ष्मी आदि छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। सभी ने दिवंगत आत्मा की शांति हेतु दो मिनट का मौन रखा।

